Thursday, 13 July 2017

" एक दिन "

एक दिन काटना ,,
एक पहाड़ सा दिन अकेले काटना कितना मुश्किल है ,
ये उससे बेहतर कौन जानेगा जिसके कमरे में एक आईना तक नही की खुद से ही थोड़ी बात कर ले ,
               गुलज़ार ने कहा है कि "वक़्त काटना क्या मुश्किल है !!  वक़्त के इतने हिस्से करो फिर उनके इतने "
बेशक ये मुमकिन होता पर तब जब ये हो पाता ,,
हम चाहे वक़्त के कितने ही हिस्से कर ले, लेकिन उस वक़्त का हर एक पल तुम्हारे सीने पर उसी पहाड़ सा रहेगा ,,
       "भारी ओर निष्ठुर "
अकेले वक़्त काटना उस पानी सा गहरा है जिसमे बहुत गंदगी है ,,
सिर्फ और सिर्फ नकारात्मकता से भरा हुआ ,,
अकेलापन तुम्हे धकेलता है एक गहरी अंधेरी खाई में ,
जहाँ दम घुटता है ,
ओर धीरे धीरे वक़्त थम जाता है ..!!
तुम लाख किताबे पढ़ लो , हज़ार नग्मे गुनगुना लो , कई कविताएं लिख डालो ,
पर जब कई घंटों बाद घड़ी देखोगे तब भी वक़्त का एक ही पहर बीता होगा ,,
अभी बाकी के पहर भी तो बिताने है ,
मन को कही दूर भागने से बचाना है ,, उसे खाली हाथ , थका हुआ ,मायूस नही देखना चाहती मैं ,,
अब यही खत्म करती हूं , कबसे लिख रही हूं और देखो दो पल ही गुज़रे है !!
         खैर !!! वक़्त काटना क्या मुश्किल है ... :))

Wednesday, 28 June 2017

"उर्मिला " सी मोहब्बत

इंतज़ार की हद अब बहुत हो गई ,
बिन तुम्हारे जीने की जद्दोजहद बहुत हो गई ,
सुख गया है आँखो का नमक भी अब ,
लौट आओ की एतबार की भी हद हो गई ,..!!
           जाने कितने मौसम गुज़रे इंतज़ार में तुम्हारे ,
           जाने कितने त्योहारो में हँसने के दिन भी रो के गुज़रे,
तुम बिन ना जीवन मे श्रृंगार है ,
ना ही कोई रोशनी !!
हथेलियों की रची हुई मेहंदी हर बार फीकी रचती है ,
हर रोज़ आँखों के काले घेरे पर दुनिया सवाल करती है ,
   जाने कितनी आहटों पर भागी जाती हूँ दरवाज़े पर ,,
   जाने कितनी करवटों में ढूंढती हूँ तुम्हारा आलिंगन ,
हर बार निवाला पेट मे जाता है ,,
और जाते हुए हर निवाले के साथ कलेजा मुंह को आता है ,,
   जाने कितनी बार अपने कांपते हाथों पर खुद का ही हाथ रखा है मैंने ,
जाने कितनी बार खुद को खुद के ही साथ रखा है मैंने !!
    पल पल जो गुज़र रहा है बिन तुम्हारे  ,,  
   मेरे अंदर कई सदियां गुज़ारता जा रहा है ,,
मुझे यकीन है तुम सिर्फ मेरे हो ,,
फिर भी देखो ना अकेले ही कटती जा रही है ज़िन्दगानी मेरी,
    लम्हा -लम्हा इंतज़ार की किश्त उम्र भर चुकानी है ,
    मुझे शायद ये उम्र तुम्हारे बगैर ही बितानी है !!

Wednesday, 22 March 2017

फिर कभी :))

हाँ ये खत तुम्हारे लिए है ,,
हमें कुदरत ने मिलवाया तो है पर साथ रहने की लकीर दोनों के हाथों में अधूरी है ,,,
एक कहानी जिसे लिखना बाकी है,,
उसी का किरदार है हम दोनों ...

वैसे ईश्वर हमें मिलाता तो है ,, हमारी मुलाकात हो जाती है कई महीनों में एक बार ,,
जो ना मिलने के बराबर होती है ,,
सहजता से मिलना, औपचारिकता करना ,,
इससे ज्यादा तो मैं ख्वाबों में तुम्हारे करीब होती हूँ ,
मैं चाहती हूँ मिलते ही तुमसे लिपट जाऊं ,,
इस तरह की हम दो है ये समझने में सामने वाले को वक़्त लगे ,,
खैर !!
ये मिलने के आस पास वाला मिलना भी अच्छा है ,,
इससे सुकुन के आस पास का सुकुन भी मिल ही जाता है ...

एक ही जन्म की तो बात है अगले जन्म में ज़िन्दगी से पहले तुमको मांग लुंगी हमेशा हर जन्म के लिए ...

फिर हम उन सब जगहों पर जाएंगे जहाँ जाने के सपने हमने इस जन्म में देखे थे ,,

हम भी कुछ चंद प्रेमियों की तरह दूर रहने की तपस्या कर रहे है
क्या पता शायद हमें वरदान मांगने को मिल जाए और हम एक दूजे को मांग ले..
अब चलती हूँ , अभी तो और भी बहुत सोचना है न अगले जन्म में करने को ...
     अलविदा :))

Saturday, 17 December 2016

मेरा ख़त "मेरे घर "को

4 दिन हुए पापा की भुआ आयी थी घर में ,
    "मेरे घर की सबसे बड़ी बेटी"
86 वर्ष की उम्र है ,
न आँखों में रौशनी है न कानो में आवाज़ ,,
आज जाते वक़्त उन्होंने कहा - मुझे पूरा घर घुमा दे ,,
मेरे पापा मेरे भाई का घर है पता नही अब यहां आ भी पाऊं या नही ,,
उन्होंने हर कमरे की हर दीवार को छू छू कर खुद में उतारा ,,भीगी आँखों से ,,
वो स्पर्श उनमें अब तक जीवंत है ,,कैसा अजीब सा रिश्ता है ये ,

इन दीवारों की धड़कन सुन रही हो जैसे वो...

उनके एक एक शब्द में लाखों दुआएं थी जैसे ,

जब इतने वर्षों में इनका मोह न छूटा तो मैं तो घर को ढंग से जी भी नही हूँ अब तक,,
जहाँ जिस आँगन में ,  मैं जीजी भैय्यू साथ खेल कर बड़े हुए,,

जिस कमरे की दीवारों दरवाजो को हमने अपने नाम ,,
सोरी थैंक यू से लिख कर भरा है ,
उस कमरे को नही छोड़ना ,
ये कैसी ख़ुशी है !! जो अपनों को छोड़कर मिलती है,

ये कैसी रीत है !! जहाँ आशियाँ बनाओ और छोड़ जाओ ,

मुझे ये खुशियां नही चाहिए पापा ,,

मुझे यहीं रहना है इसी घर में...

खैर !! सोच टूट गयी मेरी ,,
भुआ जाते हुए गाना गा रही थी रोने से रोक नही पाई खुद को
                   "साड़ा चिड़ियाँ दा चम्बा वे ,
                        बाबुल असाँ उड़ जाना !!!

Wednesday, 12 October 2016

अँधेरा ...

तुमने मुझे उन्ही अंधेरो में वापस लाकर छोड़ दिया है जहाँ से निकालने के लिए हाथ थामा था मेरा...
मैं हूँ ना!!!
ये शब्द मेरी दुआओ से बढ़ कर हो गए थे...
तुम हो ना कैसा डर.....
तुम नही थे छोड़ गए...
पर तुम्हारे ना होते हुये खुद को तुम्हारे होने का एहसास दिलाते दिलाते खुद का होना छुट गया पीछे...
जहाँ ना जाना सम्भव है ना मुड़ कर देखना भी ...
डरती हूँ अब...
अहसासो से वादों से बातो से....
और तुमसे...
बहुत डरती हूँ तुमसे..
नही कहती कुछ डर है कब रूठ जाओ कब छोड़ जाओ.....
वो मन का एक छोटा सा कोना होता है ना जहाँ अनकही बातो को संजो कर रखते है...वो कोना अब कमरा हो गया है
वही कमरा जहाँ पुराना सामान याद के तौर पर सिर्फ रखने भर को खुलता है....
तुम सुनते नहीं ..पूछते भी नहीं..जाने कितनी बाते भर गयी है मन में अब....
बिखर जाएगा कभी..बिखरना ही है...कब तक कुछ रहेगा जबरदस्ती...
कब तक वो सिर्फ संभालेगा..
मौसम के बदलने पर पेड़ो को भी पहाड़ो की ओट में सुरक्षा महसूस होती है....
फिर खुद से डर कर खुद का भागना...
नामुमकिन है ना....
हाँ खुद से क्योंकि डर तुमसे है और मैं तुम ही तो हो गयी हूँ अब...
पहचानती नहीं अब....खुद पर इतना तरस कभी नही खाया मैंने...
टूटी हुई चप्पलें सिर्फ दर्द ही देती है ...
मुश्किल सफर है...
शायद इसलिए छोड़ गए तुम यहां.. चल नही पाते..कमज़ोर हो तुम....डरपोक भी, साहस नहीं है तुममे प्यार करने का, लड़ने का सबसे,,
अच्छा है....मैं वहीँ हूँ तो क्या...तुम बढ़ गए ना आगे...तुम बढ़ते रहना....खुश हूँ मैं...खुश रहूँगी मैं.....क्योंकि खुश हो ना तुम ऐसे....खुश रहो बस.....खुश रहो..

Tuesday, 20 September 2016

इकतरफा.....

लड़का सभी कवि और शायरो को पढ़ कर अपनी प्रेम कहानी वैसी ही बनाते जा रहा था ...
जानबूझ कर दूरियां बढ़ाता ,
उसने कभी कहा नही पर
लड़की जानती थी वो अपनी प्रेम कहानी को वैसी ही उनकी तरह समझता था....

ग़ालिब या और भी उसके मोहब्बत के मसीहा..
जो दूर रहकर नज़्म लिख कर प्यार में खुद एक किताब बन गए थे....

लड़का यही चाहता था , इश्क़ में कहानी बनना पर लड़की कमज़ोर थी ,
ऊपर से किसी पूरी नज़्म की तरह चहकती पर अंदर से शब्द शब्द बिखरी हुई.....

लड़के के पास काम था ,शराब थी, नज़्म थी और किताबें थी

और लड़की के पास तो खुद वो भी नहीं थी.. इससे बड़ी सजा कोई क्या देगा मोहब्बत में की जान भी ले ली और ज़िंदा भी छोड़ दिया ...

वो उसी के लिए उसके शहर आयी थी , लड़के के अनुसार सिर्फ मिलना प्यार की परिभाषा नही थी , लड़की की सोच अलग थी ,

लड़की चाहती कुछ नही बस लड़का उसे दम भर देख ले....ऐसे की लड़की को लगे बस आज ही इसी पल में मौत आ जाये और मर कर वो उसकी अमर नज़्म बन जाये... 

वो पूरी तरह से इश्क के दायरे में थी, लड़का सरहद पर था मर्ज़ी से इश्क के अंदर बाहर का संतुलन रखता , लड़की अकेली दोनों हो रही थी इश्क़ में ....

खैर कुछ रिश्ते यूँ भी खत्म होते है .....हर अंत हसीन नही होता....
:))

Sunday, 26 June 2016

तस्वीर तेरी ....

अक्सर सोचती हूँ देख कर तस्वीर तेरी ,
जो तुझसे मोहब्बत ना होती तो क्या होती ज़िन्दगी मेरी ,
कई बेमंज़िल राहों पर भटकती ,
तन्हाई से भी तन्हा रहती ,
वादों कसमो पर हँसती ,
नहीं सिख पाती अकेले में मुस्कुराना ,
अल्फाज़ो का दरिया होकर भी खामोश रहती ,
तेरे इंकार का डर नही है मुझको ,
शुक्र है किसी से मोहब्बत करी ,
जिस खुदा की रोज अरदास करती
उसी खुदा के अक्स की तुझमे इबादत करी ,
जो तू ना होता तो महसूस ना करती इन हवाओ को ,,
खुद में रहकर खुद से ही अनजान होती
बिन तेरे नाराज़ रहती हर ख़ुशी से.....
अक्सर सोचती हूँ देखकर तस्वीर तेरी ,
जो तुझसे मोहब्बत ना होती तो क्या होती ज़िन्दगी मेरी....